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ग़ज़ल
शराब पी चुके बे-चारे को इजाज़त दो
खड़ा है देर से रुख़्सत को ऐ निगार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
वाइ'ज़ शराब-ओ-हूर की उल्फ़त में ग़र्क़ है
है सर से पाँव तक ये सितम-गर तमाम हिर्स
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ने'मत-ए-ग़म से जो दिल महरूम हो वो दिल नहीं
जाम ख़ाली हो तो क्यों कर उस को पैमाना कहें
कँवल एम ए
नज़्म
नज़्र-ए-वतन
फिर चाँदनी में दामन-ए-दरिया ये ऐ नदीम
रक़्स-ए-शराब-ओ-गर्दिश-ए-पैमाना चाहिए