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नज़्म
नया साल
दर्द के पैरहन-ए-चाक से झाँको तो ज़रा
मुर्दा सूरज पे लटकते हुए मैले बादल
अहमद नदीम क़ासमी
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शेर
तेरे ख़ुश-पोश फ़क़ीरों से वो मिलते तो सही
जो ये कहते हैं वफ़ा पैरहन-ए-चाक में है
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
तेरे ख़ुश-पोश फ़क़ीरों से वो मिलते तो सही
जो ये कहते हैं वफ़ा पैरहन-ए-चाक में है
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
अहद-ए-वफ़ा को तोड़ के हम भी हैं मुज़्महिल
तुम भी उधर हो चाक गरेबाँ किए हुए
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
सद-चाक किया पैरहन-ए-गुल को सबा ने
जब वो न तिरी ख़ूबी-ए-पोशाक को पहुँचा
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
ग़ज़ल
देखो तो ज़र्फ़-ए-दिल-ए-चाक भी ऐ दाद-रसाँ
चश्म-ए-पुर-आब को भी दश्त-ए-तपाँ तक लाए
अरसलान अहमद आकिफ़
नज़्म
आज
याँ ब-ईं आलिम ग़ुरूर-ए-यूसुफ़ियत भी नहीं
वाँ ज़ुलेख़ाई ब-अज़्म-ए-चाक-दामानी है आज