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ग़ज़ल
दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
इतना मालूम है!
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगा
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
चले लाख चाल दुनिया हो ज़माना लाख दुश्मन
जो तिरी पनाह में हो उसे क्या किसी से डरना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
परछाइयाँ
वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
मर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाह
साया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाह

