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नज़्म
चाट वाला
यूँ सुर्ख़ से तुले हैं ये पपड़ियाँ समोसे
जो इक नज़र भी देखे खाने की बात सोचे
अब्दुल मतीन नियाज़
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mu.nh par pap.Diyaa.n ba.ndhnaa
मुँह पर पपड़ियाँ बँधना مُنہ پَر پَپڑِیاں بَندھنا
गर्मी या प्यास के कारण होंठ वग़ैरा सूख जाना अथवा चेहरा बेरौनक़ हो जाना
ho.nTo.n par pap.Diyaa.n jamnaa
होंटों पर पपड़ियाँ जमना ہونْٹوں پَر پَپڑِیاں جَمنا
خشکی ، گرمی یا ڈر سے ہونٹوں کی جلد کا سخت ہوکر پپڑی سی بن جانا ؛ نہایت سخت حالات سے گزرنے کی وجہ سے ہونٹوں کا خشک ہو جانا ۔
ho.nTo.n par pap.Diyaa.n ba.ndhnaa
होंटों पर पपड़ियाँ बँधना ہونْٹوں پَر پَپڑِیاں بَندھنا
रुक : होंटों पर पपड़ी / पपड़ीयाँ जमुना
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नज़्म
शिकवा
क़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईं
पत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
मुझ को यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं
जावेद अख़्तर
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा कर
शबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
परछाइयाँ
हसीन फूल हसीं पतियाँ हसीं शाख़ें
लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह
साहिर लुधियानवी
नज़्म
समुंदर का बुलावा
गिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस पर
मिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैं
मीराजी
नज़्म
ज़ौक़ ओ शौक़
गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गए
रेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इंतिज़ार
पतियाँ खड़कीं तो समझा कि लो आप आ ही गए
सज्दे मसरूर कि मा'बूद को हम पा ही गए
