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नज़्म
रंग है दिल का मिरे
ज़र्द पत्तों का ख़स-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख़ फूलों का दहकते हुए गुलज़ार का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे
बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी
राहत इंदौरी
नज़्म
चलो छोड़ो
अहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों का
तलब सूखे हुए पत्तों का बे-रौनक़ जज़ीरा है
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
नोच कर शाख़ों के तन से ख़ुश्क पत्तों का लिबास
ज़र्द मौसम बाँझ-रुत को बे-लिबासी दे गया
मोहसिन नक़वी
नज़्म
एक ख़्वाब
ताश के पत्तों पे लड़ती है कभी खेल में मुझ से
और कभी लड़ती भी ऐसे है कि बस खेल रही है
गुलज़ार
ग़ज़ल
ज़मीं की गोद भरती है तो क़ुदरत भी चहकती है
नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं


