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नज़्म
गाँधी के बा'द
दिल ही अफ़्सुर्दा हो जब पेशकश-ए-सहबा क्या
आँख ही जब न रहे दावत-ए-नज़्ज़ारा क्या
इज़हार मलीहाबादी
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ग़ज़ल
मैं कभी तन्हा नहीं होता सर-ए-कुंज-ए-चमन
वो न हों तो हाथ में दस्त-ए-सबा रखता हूँ मैं
सहबा अख़्तर
शेर
'सहबा' साहब दरिया हो तो दरिया जैसी बात करो
तेज़ हवा से लहर तो इक जौहड़ में भी आ जाती है
सहबा अख़्तर
ग़ज़ल
जिन को है इस्लाम का दा'वा 'सहबा' उन का हाल भी देख
मैं तो ख़ैर बुतों का हो कर महरूम-ए-इस्लाम हुआ