aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "peshkash-e-sahbaa"
मस्त-ए-सहबा-ए-मोहब्बत है अज़ल से 'सहबा'इस को शीशे की ज़रूरत है न पैमानों की
हुक्म दे जान-ए-'सहबा' नई फ़िक्र काये ग़ज़ल भी अगर तेरे क़ाबिल न हो
जान-ए-'सहबा' सच कहो पैहम सहारे याद हैंवो निगाह-ए-अव्वलीं के क्या शरारे याद हैंयाद हैं वो दर्द की बढ़ती हुई बेताबियाँसर्द आहें ख़ुश्क-लब आँसू के धारे याद हैंवो मय-ए-उल्फ़त पिला देना निगाह-ए-मस्त सेवादा-ए-रंगीं के वो अल्फ़ाज़ प्यारे याद हैंनौ-ब-नौ साज़-ए-मोहब्बत की वो नग़्मा-संजियाँवो तरन्नुम वो तबस्सुम वो नज़ारे याद हैंयाद हैं वो बज़्म-ए-इशरत की सुकूँ-सामानियाँशब की ख़ामोशी वो दरिया के किनारे याद हैंवो फ़ज़ा-ए-रूह-परवर वो बहार-ए-जाँ-फ़ज़ावस्ल की शब के तुम्हें वो चाँद तारे याद हैंमेरी जानिब वो भरी महफ़िल में ख़ामोशी के साथअपनी चश्म-ए-मस्त के रंगीं इशारे याद हैंफिर ज़रा धीमे सुरों में गुनगुनाना शे'र काफूल से झड़ते हुए गर्दूं के तारे याद हैंआधी आधी रात तक शाम-ए-मोहब्बत की बहारसुब्ह की तनवीर में जल्वे तुम्हारे याद हैंयाद हैं 'सहबा' शबाब-ओ-शेर की रंगीनियाँहाँ हदीस-ए-इश्क़ के अल्फ़ाज़ सारे याद हैंआज भी मैं सुन रहा हूँ नग़्मा-हा-ए-जाँ-फ़ज़ादौड़ती है साज़-ए-हस्ती में तिरी रंगीं नवा
'सहबा' ये शहर-ए-ज़ीस्त सदाओं का शहर हैयानी तनाब-ए-हसरत-ए-हुस्न-ए-बयान खींच
ख़ुम कहीं साग़र कहीं मुतरिब कहीं 'सहबा' कहींकौन है जो माइल-ए-बे-पर्दा-दार-ए-नग़्मा है
मैं उस को हाथ लगाता भी किस तरह 'सहबा'अजीब कश्मकश-ए-जाँ अज़ाँ विसाल-ओ-फ़िराक़
रंगीन ख़्वाब बन के समाती चली गईंमदहोशियों को और बढ़ाती चली गईंअल्लह रे शान-ए-हुस्न कि तस्लीम-ए-शौक़ परनज़रें उठाए सर को झुकाती चली गईंहुस्न-ए-जहाँ-पनाह की अल्लाह रे कशिशहर इक निगह को बर्क़ बनाती चली गईंनींदों में हुस्न और जवानी की करवटेंख़्वाबों के राज़ राज़ बनाती चली गईंअल्लह रे ये नक़ाब ये हुस्न-ए-फ़ुसूँ-तराज़पर्दों के तार तार उड़ाती चली गईंउन के जलाल-ए-हुस्न का चर्चा है हर जगहकल रात चाँद को भी झुकाती चली गईंआई हो ठहरो ज़ीनत-ए-बज़्म-ए-मकाँ बनोझिजकीं रुकीं ठहर के लजाती चली गईंअल्लाह ताब कैसे मैं लाऊँ निगाह कीरग रग को जैसे बर्क़ बनाती चली गईं'सहबा'-असर निगाह है हर जुम्बिश-ए-निगाहनज़रों से जाम-ए-मस्त पिलाती चली गईं
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में जान-ए-बहार बन करहस्ती के ज़मज़मों में साज़-ए-क़रार बन करसहबा-ए-आतिशीं का रंगीं ख़ुमार बन करदौर-ए-शराब बन कर जान-ए-शराब आ जादुनिया-ए-दिल के मालिक हाँ बे-हिजाब आ जा
तग़ईर-ए-ज़माना के हाथों ख़ुद अपनी हक़ीक़त भूल गएदुनिया के तरीक़े याद रहे ख़ुद अपनी तरीक़त भूल गएगुलहा-ए-तमन्ना चुन चुन के आराइश-ए-महफ़िल याद रहीकलियों का मसलना याद रहा फूलों की नज़ाकत भूल गएहर शाम फ़िदा-ए-नोश रहे हर सुब्ह ख़ुमार-आलूद रहेआग़ाज़-ए-मसर्रत याद रहा अंजाम-ए-मसर्रत भूल गएदामान-ए-नज़र के परतव में तख़्ईल के गूना-गूँ नक़्शेइक नक़्श-ए-तसव्वुर बन तो गए पर अपनी ही सूरत भूल गएअल्लाह-रे फ़रेब-ए-रंग-ए-अमल मद-होशी-ए-आलम क्या कहनागिर्दाब-ए-हवादिस से निकले तूफ़ान की हालत भूल गएईमान-ओ-मोहब्बत के जल्वे सब नफ़्स के ताबे' हो के रहेपैमाना-ए-उल्फ़त फेंक दिया पैमान-ए-मोहब्बत भूल गएजब आँख लगी मजबूर न थे बेदार हुए मायूस हुएऐ रहरव-ए-मंज़िल राह बता हम राह-ए-सदाक़त भूल गएमहफ़िल भी वही मुतरिब भी वही सहबा भी वही साग़र भी वहीमय-नोश जो पीने आए थे सहबा-ए-मोहब्बत भूल गए
ग़रीब-ए-शहर पे दरवाज़े बंद हैं 'सहबा'हमारे नाम पे चश्मक मु'आसिरीन में है
कहने को आम रस्म-ए-शिकायात हो गईलब तक न आई बात मगर बात हो गईहँस हँस के पी लिए ग़म-ए-दौराँ के तल्ख़ जामयूँ साज़गार गर्दिश-ए-हालात हो गईज़िंदाँ की शब नज़र के उजाले ख़याल-ए-दोस्तयकजा हुए तो पुर्सिश-ए-हालात हो गईमहविय्यत-ए-हिकायत-ए-दौराँ न पोछिएकब दिन हुआ ख़बर नहीं कब रात हो गईजो आसमाँ-नशीं हैं उन्हें इस का इल्म हैजब भी ज़मीं पर आए उन्हें मात हो गईगुलशन क़फ़स बहार गरेबाँ जुनूँ ख़िरदमरबूत इन से बज़्म-ए-ख़राबात हो गई'सहबा' असर निगाह की अल्लाह रे कश्मकशनींदों में कैफ़-ओ-कम की शुरूआ'त हो गई
यहाँ की रस्म है 'सहबा' कसाद-बाज़ारीये जिंस-ए-दिल है बड़ी बे-बहा दुकाँ से उठा
मजबूर नहीं फ़ितरत-ए-आज़ाद तुम्हारीफिर क्यों नहीं करते हो ग़ुलामी का जिगर चाकक़ुदरत ने तुम्हें अशरफ़-ए-मख़्लूक़ बनायाक्यों ख़ाक है ये पस्ती-ए-अफ़्कार से नमनाकजो क़ौम हो पस्ती के ख़यालात पे माइलउस क़ौम को हासिल नहीं फिर रिफ़अत-ए-अफ़्लाकक्यों गर्दिश-ए-अय्याम की करते हो शिकायतक्यों वुसअत-ए-आफ़ाक़ में होते नहीं बेबाकइंसान भी आज़ाद है फ़ितरत भी है आज़ादक्यों रस्म-ए-ग़ुलामी से फ़ज़ा सारी है नापाक'सहबा' तुझे उस क़ौम का ग़म है जिसे अपनीहालत के तग़य्युर का न एहसास न इदराक
मैं कभी तन्हा नहीं होता सर-ए-कुंज-ए-चमनवो न हों तो हाथ में दस्त-ए-सबा रखता हूँ मैं
फ़ज़ा में रक़्स है 'सहबा' हसीं परिंदों कामुझे भी हसरत-ए-परवाज़ है किसी के साथ
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