रंगीन ख़्वाब बन के समाती चली गईं
मदहोशियों को और बढ़ाती चली गईं
अल्लह रे शान-ए-हुस्न कि तस्लीम-ए-शौक़ पर
नज़रें उठाए सर को झुकाती चली गईं
हुस्न-ए-जहाँ-पनाह की अल्लाह रे कशिश
हर इक निगह को बर्क़ बनाती चली गईं
नींदों में हुस्न और जवानी की करवटें
ख़्वाबों के राज़ राज़ बनाती चली गईं
अल्लह रे ये नक़ाब ये हुस्न-ए-फ़ुसूँ-तराज़
पर्दों के तार तार उड़ाती चली गईं
उन के जलाल-ए-हुस्न का चर्चा है हर जगह
कल रात चाँद को भी झुकाती चली गईं
आई हो ठहरो ज़ीनत-ए-बज़्म-ए-मकाँ बनो
झिजकीं रुकीं ठहर के लजाती चली गईं
अल्लाह ताब कैसे मैं लाऊँ निगाह की
रग रग को जैसे बर्क़ बनाती चली गईं
'सहबा'-असर निगाह है हर जुम्बिश-ए-निगाह
नज़रों से जाम-ए-मस्त पिलाती चली गईं