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नज़्म
हसन कूज़ा-गर (1)
ज़माना, जहाँ-ज़ाद वो चाक है जिस पे मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू
और फ़ानूस-ओ-गुलदां
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
साबिर ज़फ़र
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नज़्म
जहाँ ज़ाद
जिस पे मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस-ओ-गुलदां की मानिंद
बनते बिगड़ते हैं इंसाँ
इशरत आफ़रीं
नज़्म
इल्म की ज़रूरत
ज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होना
ज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होना
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ये बस्ती मेरी बस्ती है
यहाँ माह-ए-मुहर्रम की नुमूदारी पे यकसाँ जोश से
फ़ारूक़-ओ-हैदर आइशा-ओ-फ़ातिमा मिल कर
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
फ़क़ीह-ओ-शैख़ के ज़ेहनों में बुत होंगे ख़ुदाओं के
मैं इंसाँ हूँ मुझे तो सिर्फ़ इंसाँ याद आते हैं
अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल
शिकस्त खा चुके हैं हम मगर अज़ीज़ फ़ातेहो
हमारे क़द से कम न हो फ़राज़-ए-दार देखना
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
नज़्म
आरज़ू राहिबा है
लड़खड़ाती हुई फ़र्श-ओ-दर-ओ-दीवार से टकराती हुई
दिल में कहती है कि इस शम्अ' की लौ ही शायद
![शेख] अबुल फतोह राज़ी शेख] अबुल फतोह राज़ी](https://rekhta.pc.cdn.bitgravity.com/content/images/quillM.png)
