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ग़ज़ल
अबु मोहम्मद सहर
ग़ज़ल
दिन में भी हम देखने वाले ख़्वाब कहाँ आँखें फोड़ें
ख़्वाबों से पहले ही हम को ताबीरों ने घेर लिया
मुज़्तर मजाज़
कुल्लियात
हम बे-नसीब सर को पत्थर से क्यों न फोड़ें
पहुँचा कभू न जब्हा उस संग-ए-आस्ताँ तक
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूट सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
उसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगे
न जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगी
जौन एलिया
ग़ज़ल
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग
जू-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का
अहमद फ़राज़
नज़्म
बंजारा-नामा
जब पूँजी बाट में बिखरेगी हर आन बनेगी जान ऊपर
नौबत नक़्क़ारे बान निशान दौलत हशमत फ़ौजें लश्कर
