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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शीशों का मसीहा कोई नहीं
फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये साग़र ले कर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर तोड़ दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
बेदाद-गरों की बस्ती है याँ दाद कहाँ ख़ैरात कहाँ
सर फोड़ती फिरती है नादाँ फ़रियाद जो दर दर जाती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ऐसे शख़्स को मीर बनाया जो बस ख़्वाब दिखाता था
बस्ती के लोगों ने अपना-आप मुक़द्दर फोड़ लिया
