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नज़्म
शिकवा
लुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में
कुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी की
बहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ को
जौन एलिया
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
सबा अफ़ग़ानी
ग़ज़ल
अज्ञात
ग़ज़ल
ज़ुबैर अली ताबिश
शेर
ख़ुश्क बातों में कहाँ है शैख़ कैफ़-ए-ज़िंदगी
वो तो पी कर ही मिलेगा जो मज़ा पीने में है
अर्श मलसियानी
नज़्म
मुफ़्लिसी
चूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी है
पीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी है

