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नज़्म
हम लोग
हर्फ़ में क्यों न हमारे हो सुरूर-ए-मय-नाब
ख़ाकसारन-ए-दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हैं हम लोग
अली मीनाई
ग़ज़ल
जिगर बरेलवी
ग़ज़ल
हम जो मस्जिद से दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे
बढ़ के ये बात ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे
साहिर सियालकोटी
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ग़ज़ल
रिंदों में यूँ ही बख़्शिश-ए-पीर-ए-मुग़ाँ रहे
हो लाख क़हत फिर भी ये दरिया रवाँ रहे
अब्दुस्सलाम नदवी
ग़ज़ल
जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी
पुरानी दोस्ती भी ताक़ पर ऐ मेहरबाँ रख दी
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
रहा करते हैं मय-ख़ानों में हम पीर-ए-मुग़ाँ हो कर
तबीअत ज़िंदा-दिल रखती है पीरी में जवाँ हो कर
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ-मर्द हो गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
जुरअत हो तो पूछे ये कोई पीर-ए-मुग़ाँ से
खिंचती है कहाँ आती है बोतल में कहाँ से