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ग़ज़ल
पीवे मेरा ही लहू मानी जो लब उस शोख़ के
खींचे तो शंगर्फ़ से ख़ून-ए-शहीदाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
अगर पीवे कोई उन को तो जल कर ख़ाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
अगर पीवे कोई उन को तो जल कर ख़ाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
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नज़्म
शिकवा
लुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में
कुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई
बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी की
बहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ को