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ग़ज़ल
समो न तारों में मुझ को कि हूँ वो सैल-ए-नवा
जो ज़िंदगी के लब-ए-मो'तबर से निकलेगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मुद्दतों के बाद फिर कुंज-ए-हिरा रौशन हुआ
किस के लब पर देखना हर्फ़-ए-दुआ रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
karnii hii sang jaat hai, jab jaa.e chhuuT sariir, ko.ii saath na de sake, maat pitaa sat biir
करनी ही संग जात है, जब जाय छूट सरीर, कोई साथ न दे सके, मात पिता सत बीर کرنی ہی سنگ جات ہے، جب جائے چھوٹ سریر، کوئی ساتھ نہ دے سکے، مات پتا ست بیر
मनुष्य के मरने पर उसके कर्म ही साथ जाते हैं, माँ-बाप, भाई या कोई कितना भी सज्जन या प्रिय व्यक्ति हो कोई साथ नहीं जाता
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ग़ज़ल
आज भी हैं वो सुलगे सुलगे तेरे लब ओ आरिज़ की तरह
जिन ज़ख़्मों पर पंखा झलते एक ज़माना बीत गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
तन्हाई सी तन्हाई है कैसे कहें कैसे समझाएँ
चश्म ओ लब-ओ-रुख़्सार की तह में रूहों के वीराने हैं
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
ज़ब्त-ए-ग़म से लाख अपनी जान पर बन आए है
हाँ मगर ये इज़्ज़त-ए-सादात तो रह जाए है
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मोहब्बत में शिकायत लब पे लाऊँ मेरी क्या जुरअत
अचानक आँख भर आई जो मैं तेरे हुज़ूर आया
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
अभी तो सैर को जाना लब-ए-दरिया वो सीखे हैं
अभी तो देखिए खिलते हैं क्या क्या गुल समुंदर में