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शेर
चुभेंगे ज़ीरा-हा-ए-शीशा-ए-दिल दस्त-ए-नाज़ुक में
सँभल कर हाथ डाला कीजिए मेरे गरेबाँ पर
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अज़-पए-दाग़-ए-दिल-ए-बादा-परसताँ 'बेदार'
पुम्बा-ए-शीशा-ए-मय मर्हम-ए-काफ़ूर हुआ
मीर मोहम्मदी बेदार
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pamba-e-shiisha-e-mai
पंबा-ए-शीशा-ए-मय پَن٘بَۂ شِیشَۂ مَے
رک : پنبۂ مینا جو زیادہ مستعمل ہے.
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ग़ज़ल
आदाब की जगह है 'ज़की' बज़्म-ए-इत्तिहाद
नाज़ुक है मिस्ल-ए-शीशा-ए-मय दिल नदीम का
मोहम्मद ज़करिय्या ख़ान
ग़ज़ल
मिरा माज़ी नज़र आया मुझे हाल-ए-हसीं हो कर
जो उन के साथ देखे थे वो मंज़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
नज़्म
रंग है दिल का मिरे
ज़हर का रंग लहू रंग शब-ए-तार का रंग
आसमाँ राहगुज़र शीशा-ए-मय
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जो हैं रिंद-ए-अज़ल गुलशन को मय-ख़ाना समझते हैं
कली को शीशा-ए-मय गुल को पैमाना समझते हैं
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
शिकवा-ए-वादा-ख़िलाफ़ी का मिला अच्छा जवाब
पेशगी रक्खी थी इक उम्मीद बर आई हुई


