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नज़्म
वासोख़्त
हाँ जो जफ़ा भी आप ने की क़ाएदे से की
हाँ हम ही कारबंद-ए-उसूल-ए-वफ़ा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
क़ाएदे क्या हमें मालूम नहीं उल्फ़त के
बे-कम-ओ-कास्त मगर उन को पढ़ा सकते नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
क़ाएदे से कब जिया है ज़िंदगी मैं ने तुझे
मैं तिरा मुजरिम हूँ मेरे जुर्म तो संगीन हैं
संदीप ठाकुर
ग़ज़ल
ब-नाम-ए-ज़िंदगी कुछ क़ाएदे रक्खे हुए हैं
नज़र ने अपने अपने ज़ाविए रक्खे हुए हैं
मोहम्मद अहमद साक़ी
ग़ज़ल
कुछ ऐसे क़ाएदे हैं कि बदल नहीं जिन का
तू नीले आसमाँ को एक लम्हा ज़र्द समझ