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ग़ज़ल
क़फ़स में फैलाएगा ये पर तो ख़ला में दस्त-ए-तलब बनेगा
और एक दिन फिर यही परिंदा रिहाइयों का सबब बनेगा
शाहनवाज़ अंसारी
ग़ज़ल
असीरान-ए-क़फ़स पर तब्सिरे का हक़ नहीं उन को
जो हद्द-ए-आशियाँ से देखते रहते हैं ज़िंदाँ को
क़ैसर अंसारी
ग़ज़ल
मुस्लिम अंसारी
ग़ज़ल
उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या
जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए