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ग़ज़ल
हम राह-रव-ए-मंज़िल दुश्वार रहे हैं
हर तरह मुसीबत में गिरफ़्तार रहे हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
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ग़ज़ल
नुक़ूश-ए-रह-रव-ए-मंज़िल रह-ए-मंज़िल में रहते हैं
चकोरों के निशान-ए-ग़म मह-ए-कामिल में रहते हैं
सोज़ बरेलवी
ग़ज़ल
इब्तिला में हैं सभी राह-रव-ए-मंज़िल-ए-शौक़
किस को फ़ुर्सत कि मिरे पाँव का काँटा देखे
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
हम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहीं
राह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये समझ लो नाशनास-ए-रह-ए-मंज़िल-ए-वफ़ा है
जो क़दम क़दम पे पूछे अभी कितना फ़ासला है
मख़्दूम ज़ादा मुख़्तार उस्मानी
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ये ज़र्रे जिन को हम ख़ाक-ए-रह-ए-मंज़़िल समझते हैं
ज़बान-ए-हाल रखते हैं ज़बान-ए-दिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
ये भी कुछ कम नहीं ऐ रह-रव-ए-इक़लीम-ए-यक़ीं
हम ख़राबात-नशीं हुस्न-ए-गुमाँ तक पहुँचे
रविश सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
रह-रव-ए-राह-ए-ज़िंदगी वक़्त से तेज़ चाल चल
राहबरों को राह में फ़ुर्सत-ए-रहज़नी न दे
ज़किया सुल्ताना नय्यर
ग़ज़ल
मैं राह-रव-ए-राह-ए-तमन्ना हूँ सितम-गर
हर ज़ख़्म पे बढ़ जाता है कुछ मेरा निशाँ और