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ग़ज़ल
ज़िंदगी भर मैं रहा हूँ रहरव-ए-राह-ए-वफ़ा
इन वफ़ाओं की मगर मैं ने सज़ा पाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
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ग़ज़ल
हैं किसी इशारे के मुंतज़िर कई शहसवार खड़े हुए
कि हो गर्म फिर कोई मा'रका मिरे ज़ब्त-ए-हाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
हम राह-रव-ए-मंज़िल दुश्वार रहे हैं
हर तरह मुसीबत में गिरफ़्तार रहे हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
अगर ज़बाँ से बयाँ हाल-ए-ग़म न हो पाया
हुज़ूर-ए-दोस्त मिरी ख़ामुशी ने साथ दिया


