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ग़ज़ल
फ़ी-ज़माना है यही मस्लहत-ए-अक़्ल-ओ-शुऊर
दिल में ख़्वाहिश कोई उभरे तो दबा ली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
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ग़ज़ल
इसी क़दर तो है सरमाया-ए-तजस्सुस-ए-अक़्ल
कि कुछ ज़मीं की ख़बर है कुछ आसमाँ का पता
बेताब अज़ीमाबादी
कुल्लियात
दिल-ओ-दीं कैसे कि उस रहज़न-ए-दिल-हा से अब
ये पड़ी है कि ख़ुदा ख़ैर करे जानों की