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ग़ज़ल
किया है क़त्ल लेकिन देखिए जाँ कब निकलती है
कि उन को रक़्स-ए-बेताबाना-ए-बिस्मिल पसंद आया
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
हम भी कुछ देर को चमके थे कि बस राख हुए
सच तो ये है कि रम-ओ-रक़्स-ए-शरर ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
कहाँ तक शिकवा-ए-बे-मेहरी-ए-अहबाब ऐ हमदम
ज़माना दरपए-आज़ार-ए-'बिस्मिल' होता जाता है
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
ज़िक्र-ए-'बिस्मिल' पे वो फ़रमाने लगे झुँझला कर
होगा कोई चलो जाने दो हमें याद नहीं
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
सितारों की ज़िया बन कर फ़रिश्तों का सलाम आया
ज़बान-ए-‘बिस्मिल’-ए-वारफ़्ता पर जब उन का नाम आया


