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ग़ज़ल
सज्दों की रस्म-ए-कोहन को होश गँवा के भूल जा
संग-ए-दर-ए-हबीब पर सर को झुका के भूल जा
ख़ुमार बाराबंकवी
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नज़्म
दीवाली
हो सके तो छोड़ दे रस्म-ए-कोहन मर्द-ए-जवाँ
ता-ब-कै दोहराए जाएगा फ़सुर्दा दास्ताँ
शातिर हकीमी
नज़्म
'ग़ालिब'
कल जो था तर्ज़-ए-जहाँ आज कहाँ है बाक़ी
साथ दे सकती नहीं आज का वो रस्म-ए-कोहन
सईद आरिफ़ी
ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बस इसी बात पे वो शख़्स ख़फ़ा है मुझ से
शहर में तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा है मुझ से
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ज़िंदा हो रस्म-ए-जुनूँ किस की नवा-रेज़ी से
अब रहा कौन यहाँ शो'ला-ब-जाँ हम-नफ़सो