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नज़्म
चाँदनी कहती है
सब हैं पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना में मगन
जान-आे-तन फ़हम-ओ-ख़िरद होश-ओ-गुमाँ
माह तलअत ज़ाहिदी
नज़्म
रेल का सफ़र
पाबंदी-ए-औक़ात में है शान-ए-ग़ुलामी
आज़ाद हुआ हिन्द तो क्या इस की ज़रूरत
रज़ा नक़वी वाही
ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बस इसी बात पे वो शख़्स ख़फ़ा है मुझ से
शहर में तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा है मुझ से


