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नज़्म
मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले
पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए
कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
अभी कमसिन हैं रस्म-ए-ताज़ियत आती नहीं उन को
ये क्या कम है मिरे फूलों में बैठे मुस्कुराते हैं
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
ज़िंदा हो रस्म-ए-जुनूँ किस की नवा-रेज़ी से
अब रहा कौन यहाँ शो'ला-ब-जाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
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ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बस इसी बात पे वो शख़्स ख़फ़ा है मुझ से
शहर में तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा है मुझ से
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ़्तादगी
एहसान है क्या क्या तिरा ऐ हुस्न-ए-बे-परवा तिरा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ज़ख़्म मिलते हैं इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल मिलता नहीं
वज़-ए-क़ातिल रह गई रस्म-ए-मसीहाई गई
आल-ए-अहमद सुरूर
शेर
हुस्न काफ़िर था अदा क़ातिल थी बातें सेहर थीं
और तो सब कुछ था लेकिन रस्म-ए-दिलदारी न थी
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
हुस्न काफ़िर था अदा क़ातिल थी बातें सेहर थीं
और तो सब कुछ था लेकिन रस्म-ए-दिलदारी न थी
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
तड़प कर मर गया वो सैद-ए-बाल-अफ़्शाँ कि मुज़्तर था
हुआ नासूर-ए-चश्म-ए-ताज़ियत चश्म-ए-ख़दंग आख़िर
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हम कहाँ और कहाँ रस्म-ओ-रह-ए-'आम-ए-ग़ज़ल
जाने किस शोख़ के सर जाएगा इल्ज़ाम-ए-ग़ज़ल
अब्दुर रऊफ़ उरूज
नज़्म
चाँद की फ़रियाद
रस्म-ए-दीदार-ए-हिलाल-ए-ईद, अफ़्साना हुई
बाम पर उस दम चढ़े, जिस वक़्त फ़रज़ाना हुई