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ग़ज़ल
'महशर' अच्छा है ख़्याल-ए-रस्म-ओ-राह-ए-दिल मगर
बात नाज़ुक है ज़बाँ पर सोच कर लाया करें
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
हम कहाँ और कहाँ रस्म-ओ-रह-ए-'आम-ए-ग़ज़ल
जाने किस शोख़ के सर जाएगा इल्ज़ाम-ए-ग़ज़ल
अब्दुर रऊफ़ उरूज
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raam ke bhagat kaaTh kii gu.Diyaa, din bhar Thak-Thak raat aa.e ghuskuriyaa
राम के भगत काठ की गुड़िया, दिन भर ठक-ठक रात आए घुसकुरिया رام کے بَھگت کاٹھ کی گُڑیا، دِن بھَر ٹھک ٹھک رات آئے گُھسکُرِیا
पुजारियों पर व्यंग है कि ये लकड़ी की पुतली की तरह हैं दिन भर ठक-ठक होती रहती है रात को सो जाते हैं
maal-e-muft dil-e-be-rahm
माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बे-रहम مالِ مُفْت دِلِ بے رَحْم
उस समय पर बोलते हैं जब पराया माल अंधाधुंध ख़र्च किया जाए
raam ke bhakt kaaTh kii gu.Diyaa, din bhar Thak-Thak raat aa.e ghuskuriyaa
राम के भक्त काठ की गुड़िया, दिन भर ठक-ठक रात आए घुसकुरिया رام کے بَھکت کاٹھ کی گُڑیا، دِن بھَر ٹھک ٹھک رات آئے گُھسکُرِیا
haajat-e-mashshaata niist ruu-e-dil aaraam raa
हाजत-ए-मश्शाता नीस्त रू-ए-दिल आराम रा حاجَتِ مَشّاطَہ نِیسْت رُوئے دِل آرام را
beauty needs no ornaments
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ग़ज़ल
ख़ौफ़-ज़दा लोगों से रस्म-ओ-राह बढ़ाते फिरते हैं
हम बे-ख़्वाबी के मौसम में ख़्वाब दिखाते फिरते हैं
मोहसिन असरार
शेर
रोज़-ए-अज़ल से आप की मेरी कैसी रस्म-ओ-राह निभी
अव्वल अव्वल हम हुए शैदा आख़िर शैदा आप हुए
इज्तिबा रिज़वी
कुल्लियात
छोड़ा जुनूँ के दौर में रस्म-ओ-रह-ए-इस्लाम को
तह कर सनम-ख़ाने चला हूँ जामा-ए-एहराम को
मीर तक़ी मीर
क़ितआ
इन दिनों रस्म-ओ-रह-ए-शहर-ए-निगाराँ क्या है
क़ासिदा क़ीमत-ए-गुल-गश्त-ए-बहाराँ क्या है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं
वो शख़्स दिल से किसी का भी ख़ैर-ख़्वाह नहीं
जलील ’आली’
ग़ज़ल
रखते हैं रस्म-ओ-राह किसी ख़ुद-निगर से हम
लेते हैं काम वुसअ'त-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र से हम

