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शेर
क्यूँ तू रोता है दिला आने दे रोज़-ए-वस्ल को
इस क़दर छेड़ूँगा उन को वो भी रो कर जाएँगे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
मेरे लहजे में जो ठहराव नहीं आया 'रोज़'
क्या मिरी तल्ख़ी-ए-हिजरत को नहीं जानते हो
रिज़वाना सईद रोज़
ग़ज़ल
हिज्र में जीने से बेहतर है हलाक-ए-रोज़-ए-वस्ल
ये तरह क्या ख़ूब रास आई है परवाने के तईं
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
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roz-e-avval
रोज़-ए-अव्वलروزِ اَوَّل
प्रथम दिन, प्रारम्भ, आरंभ, शुरुआत, आदिकाल, सृजन का दिन, प्राथन दिन, वो दिन जब ईश्वर ने मनुष्यों से प्रतिज्ञा ली थी
vasii'-o-'ariiz
वसी'-ओ-'अरीज़وَسِیع و عَرِیض
जो बहुत लंबाई और चौड़ाई रखता हो, बहुत लंबा चौड़ा, बहुत विशाल, कुशादा, शानदार
hanuuz-roz-e-avval
हनूज़-रोज़-ए-अव्वलہَنُوز روزِ اَوّل
अब तक पहला दिन है यानी काम अभी अपनी इबतिदाई हालत से आगे नहीं बढ़ा, अभी तक कुछ तरक़्क़ी नहीं की, अभी वही इबतिदा वाला मुआमला है
hanuuz roz-e-avval hai
हनूज़ रोज़-ए-अव्वल हैہَنُوز روزِ اَوَّل ہَے
۔ مثل ۔ابھی تک کچھ ترقی نہیں کی ہے۔
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ग़ज़ल
क़स्द करता हूँ हम-आग़ोशी का लेकिन रोज़-ए-वस्ल
जी निकल जाता है उस नाज़ुक बदन को देख कर
हस्सामुद्दीन हैदर नामी
ग़ज़ल
दिल ताब ही लाया न टुक ता याद रहता हम-नशीं
अब 'ऐश रोज़-ए-वस्ल का है जी में भूला ख़्वाब सा
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
दिल ताब ही लाया न टुक ता याद रहता हम-नशीं
अब ऐश रोज़-ए-वस्ल का है जी में भूला ख़्वाब सा