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ग़ज़ल
जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो
गिर्ये से शाम-ओ-सहर क्यूँ कि हमें काम न हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-ऐश-ओ-मसर्रत दिल-ए-ख़ुद-काम नहीं
है ये आराम की सूरत मगर आराम नहीं
नवाब सय्यद हकीम अहमद नक़्बी बदायूनी
ग़ज़ल
तुझे किस तरह से जल्वा दिखे ऐ 'सदा' ख़ुदा का
कि है दरमियान हाइल तिरा ज़ौक़-ए-ख़ुद-नुमाई
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
और अपने हक़ में ता'न-ए-तग़ाफ़ुल ग़ज़ब हुआ
ग़ैरों से मुल्तफ़ित बुत-ए-ख़ुद-काम हो गया
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
है फ़िराक़-ए-बुत-ए-ख़ुद-काम में 'नासिख़' का कलाम
हूँ मैं नाकाम मुझे काम से कुछ काम नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
जब कहा मैं हूँ तिरे इश्क़ में बदनाम कि तू
हँस के किस नाज़ से बोला बुत-ए-ख़ुद-काम कि तू
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
तल्क़ीन करे 'अर्ज़-ए-तमन्ना हमें उस से
महरम नहीं है उस बुत-ए-ख़ुद-काम से वाक़िफ़
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
साबिक़ा है रोज़-ए-फ़र्दा उस बुत-ए-ख़ुद-काम से
क़ब्र में सोने दे ऐ दिल दो घड़ी आराम से
सययद हुमायु मिर्ज़ा हक़ीर
ग़ज़ल
जल्द 'एहसाँ' से कहो वो बुत-ए-ख़ुद-काम आया
अब तो लिल्लाह कहीं बंद ज़बाँ कीजिएगा

