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नज़्म
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फिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नी
अपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते

