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ग़ज़ल
कारवान-ए-ज़िंदगी का लग रहा है चल चलाओ
हर-नफ़स हम को सदा-ए-कूस-ए-रेहलत हो तो हो
ब्रहमा नन्द जलीस
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नज़्म
शहीद-ए-मिल्लत-ओ-वतन!
बहार-ए-शौक़ की फ़ज़ा 'अजीब गुल खिला गई
अदा-ए-नाज़-ए-'आशिक़ी नियाज़ को सिखा गई
एस. ए. रहमान
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-सुख़न से क्या मिला बोल किसी को ऐ 'सदा'
फ़िक्र-ए-म'आश कर ज़रा छोड़ के अब तू काम ये
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
पाक-बाज़ी है बड़ी तौहीन-ए-रहमत शैख़ जी
कीजिए कुछ तो ख़ता गर है यक़ीं ग़फ़्फ़ार में
सदा अम्बालवी
नज़्म
दु'आ
इस बार बख़्श दे मिरे मौला 'सदा' को तू
क़ैद-ए-हिसार-ए-ज़ात की फिर से सज़ा न दे




