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नज़्म
इक़बाल
पर उस का गीत सब के दिलों में मुक़ीम है
और उस के लय से सैकड़ों लज़्ज़त-शनास हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रात और रेल
वो हवा में सैकड़ों जंगी दुहल बजते हुए
वो बिगुल की जाँ-फ़ज़ाँ आवाज़ लहराती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब
सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं
अमजद इस्लाम अमजद
शेर
दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब
सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
सैकड़ों मुर्दे जलाए हो मसीहा नाज़ से
मौत शर्मिंदा हुई क्या क्या तिरे एजाज़ से
भारतेंदु हरिश्चंद्र
रेख़्ती
चूम कर ज़ुल्फ़-ए-दोता फँसता नहीं जालों के बीच
साफ़ बच जाता है गोरा सैकड़ों कालों के बीच
मोहसिन ख़ान मोहसिन
ग़ज़ल
सैकड़ों गुम-शुदा दुनियाएँ दिखा दीं उस ने
आ गया लुत्फ़ उसे लुक़्मा-ए-तर देने में
राजेन्द्र मनचंदा बानी
नज़्म
हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद
सैकड़ों साल की तब्लीग़ के चालीस समर
कश्ती बन जाए तो तन्नूर से पानी उबले
आदिल मंसूरी
ग़ज़ल
सैकड़ों फ़िक्रें हैं तुम को आक़िलो
तुम से तो 'मज्ज़ूब' ही बेहतर रहा
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
नज़्म
शायर-ए-दरमाँदा
मैं मिरे दोस्त मिरे सैकड़ों अरबाब-ए-वतन
यानी अफ़रंग के गुलज़ारों के फूल