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नज़्म
इस वक़्त तो यूँ लगता है
माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी है
लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
दलीलों से दवा का काम लेना सख़्त मुश्किल है
मगर इस ग़म की ख़ातिर ये हुनर भी सीखना होगा
जौन एलिया
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
तमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत है
हज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी जिस्म-ओ-जाँ के मज़ार पर
न दिए जलें मिरी आँख में मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे
बशीर बद्र
नज़्म
बंजारा-नामा
क्या सख़्त मकाँ बनवाता है ख़म तेरे तन का है पोला
तू ऊँचे कोट उठाता है वाँ गोर गढ़े ने मुँह खोला
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दर्द-ओ-ग़म-ए-फ़िराक के ये सख़्त मरहले
हैराँ हूँ मैं कि फिर भी तुम इतने हसीं रहे
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
कौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में है
इश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ख़ाक-ओ-ख़ूँ में मिल रहा है तुर्कमान-ए-सख़्त-कोश
आग है औलाद-ए-इब्राहीम है नमरूद है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'फ़ैज़' आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे




