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ग़ज़ल
मिल न सकने के बहाने उन्हें आते हैं बहुत
ढूँड लेते हैं कोई हम भी मुलाक़ात पे बात
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे
हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी
महबूब ख़िज़ां
ग़ज़ल
हिज्र-टकसाल में ढालेगा ग़ज़ल के सिक्के
तेरी महफ़िल में कभी बोल न सकने वाला
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
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ग़ज़ल
क़तरा क़तरा रहता है दरिया से जुदा रह सकने तक
जो ताब-ए-जुदाई ला न सके वो क़तरा फ़ना हो जाता है
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
हश्र तक भी खींच नहीं सकने की सूरत यार की
गर यूँही हुज्जत रहेगी मानी-ओ-बहज़ाद में
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
नज़्म
ज़िंदा आदमी से कलाम
और गुज़रे मह-ओ-साल की दस्तकों पर
न हो सकने वालों पे आँसू बहाए हैं तुम ने
अबरार अहमद
नज़्म
औज-बिन-उनुक़
नाफ़ उस की मरकज़-ए-सक़्ल-ए-ज़माना
पेट उस का, पेट भरने के वसाएल का ख़ज़ाना


