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ग़ज़ल
कोहर में गुम-सुम समाअतो तुम गवाह रहना
मैं एक दीवार-ए-गिर्या हर रात चुन रहा हूँ
मुसव्विर सब्ज़वारी
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ग़ज़ल
मुझ से लाग़र तिरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझ से नाज़ुक मिरी नज़रों में समाते भी नहीं
दाग़ देहलवी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरा
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
जौन एलिया
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
सबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया में
कि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं




