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ग़ज़ल
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
उल्फ़त के नए दीवानों को किस तरह से कोई समझाए
नज़रों पे लगी है पाबंदी दीदार की बातें करते हैं
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
कहीं ऐसा न करना वस्ल का वा'दा तो करते हो
कि तुम को फिर कोई कुछ और समझाए तो रहने दो
मुज़्तर ख़ैराबादी
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रेख़्ता शब्दकोश
kyaa samjhaa thaa
क्या समझा था کیا سَمْجھا تھا
शायद कुछ और समझा था, जैसा तजुर्बे और मुशाहिदे में आया वैसा नहीं समझा था
KHudaa samjhe
ख़ुदा समझे خُدا سَمْجھے
बेतकल्लुफ़ी या नाराज़गी के लिए बोलते हैं
sochaa-samjhaa
सोचा-समझा سوچا سَمْجھا
समझा बूझा, सोचा-विचारा, सोच-समाझ कर किया हुआ, ध्यानपूर्वक किया हुआ
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ग़ज़ल
सागर पार की ख़बरें देखे हम-साए का पता नहीं
आज का इंसाँ आलम फ़ाज़िल उस को अब समझाए कौन
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
कौन ये नासेह को समझाए ब-तर्ज़-ए-दिल-नशीं
इश्क़ सादिक़ हो तो ग़म भी बे-मज़ा होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
इक साथ फ़ना हो जाने से इक जश्न तो बरपा होता है
यूँ तन्हा जलना ठीक नहीं समझाए कोई परवाने को
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
आ जाना
समझते हैं कहीं दीवानगान-ए-इश्क़ समझाए
तिरे होंटों पे मेरा नाम आ जाए तो आ जाना
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
होती हैं शब-ए-ग़म में यूँ दिल से मिरी बातें
जिस तरह से समझाए दीवाने को दीवाना
