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ग़ज़ल
वक़्त ले आया है ख़ुद हद में उसे देर सवेर
जिस ने भी क़द से सिवा अपनी अना रक्खी है
ख़लील-उर-रहमान राज़
नज़्म
मुझे शाम आई है शहर में
चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से
बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब
जावेद अनवर
नज़्म
बाज़ी जिन के हाथ रही
जितनी देर में तुम एक आहट से उतरते हो
और सवेर से अपनी पलकें इकट्ठी करते हो
नसरीन अंजुम भट्टी
नज़्म
देर-सवेर तो वैसे भी हो जाती है
चाँद को भी एहसास था उस का
देर-सवेर तो वैसे भी हो जाती है
फ़िरोज़ नातिक़ ख़ुसरो
नज़्म
मूर्ती-कार
फिर दिन रात क्यूँ बनाऊँ मैं तेरी मूरत
जब मेरे हालतों का कोई सवेर नहीं है
प्रिया शंदिल्या
ग़ज़ल
सुब्ह की राख का हूँ ढेर और हूँ रौशनी की रात
था भी तो जिस्म की सवेर हूँ भी तो जिस्म ही की रात










