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शेर
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की
हम्माद नियाज़ी
तंज़-ओ-मज़ाह
पतरस बुख़ारी
ग़ज़ल
वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं
यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
गुल-दान पर है नर्म सवेरे की ज़र्द धूप
हल्क़ा बना है काँपती किरनों का घाव पर




