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नज़्म
बिट्टू बातूनी
अम्मी अम्मी वो जो हैं नाँ आंटी सरवर
आज पहन कर आईं थी इक नीला जंपर
शानुल हक़ हक़्क़ी
ग़ज़ल
'नसीम' इक मो'जिज़ा है सरवर-ए-आलम का दुनिया में
अली लेटे हुए हैं और बिस्तर कुछ नहीं कहता
आफ़ताब अहमद ख़ां नसीम
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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
वो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंद
तेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक रह-गुज़र पर
गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे
दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तूबा-ए-बहिश्ती है तुम्हारा क़द-ए-रा'ना
हम क्यूँकर कहें सर्व-ए-इरम कह नहीं सकते
बहादुर शाह ज़फ़र
नअत
या-सरवर-ए-दीं शाह-ए-अरब रहमत-ए-आलम
दे कर तह-ए-दिल से ये सदा और भी कुछ माँग








