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ग़ज़ल
गुलज़ार बुख़ारी
ग़ज़ल
मैं ने चमन की ख़ातिर कौन से दुख झेले हैं
शाख़-ए-बहाराँ मेरे लिए गुल-बार न होना
गुलज़ार वफ़ा चौधरी
ग़ज़ल
नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन
क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
हमें ख़ार-ए-वतन 'गुलज़ार' प्यारे हैं गुल-ए-तर से
कि हर ज़र्रे को ख़ाक-ए-हिंद के शम्स ओ क़मर जाना