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शेर
थी यूँ तो शाम-ए-हिज्र मगर पिछली रात को
वो दर्द उठा 'फ़िराक़' कि मैं मुस्कुरा दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
शब-ए-ख़ल्वत वही हुज्जत वही तकरार रही
वही क़िस्सा वही ग़ुस्सा वही इंकार रहा
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
ग़ज़ल
बख़्त बरगश्ता वो नाराज़ ज़माना दुश्मन
कोई मेरा है न ऐ 'हिज्र' किसी का मैं हूँ
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
शेर
ऐ हिज्र वक़्त टल नहीं सकता है मौत का
लेकिन ये देखना है कि मिट्टी कहाँ की है