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ग़ज़ल
क्यूँ कहूँ क़ामत को तेरे ऐ बुत-ए-राना अलिफ़
और कुछ ख़ूबी नहीं रखता है इक सीधा अलिफ़
जोशिश अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
ऐ बुत-ए-ना-आश्ना कब तुझ से बेगाने हैं हम
तू अगर इस बज़्म में मय है तो पैमाने हैं हम
रज़ा अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं
कौन सी शब है कि ख़ंजर से जिगर चाक नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
तू अगर मुझ से जुदा ऐ बुत-ए-नादाँ होगा
मिस्ल-ए-नाक़ूस ये दिल हिज्र में नालाँ होगा
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
शेर
जान जानी है मिरी ऐ बुत-ए-कम-सिन तुझ पर
मर ही जाऊँगा गला काट के इक दिन तुझ पर

