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ग़ज़ल
सई तू अपनी न कर ऐ गिर्या सर्फ़-ए-शिस्त-ओ-शू
दिल के धोने से कोई ये दाग़ काले जाते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
किस किस को तुम भूल गए हो ग़ौर से देखो बादा-कशो
शीश-महल के रहने वाले पत्थर ढोने वाले हैं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
शेर
तामीर-ओ-तरक़्क़ी वाले हैं कहिए भी तो उन को क्या कहिए
जो शीश-महल में बैठे हुए मज़दूर की बातें करते हैं
ओबैदुर रहमान
नज़्म
हिण्डोला
ग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादू
शफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ से
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बाज़-आमद --- एक मुन्ताज
मैं भी घुस आता हूँ इस शीश-महल में देखो
सब हँसी रोक के कहती हैं निकालो इस को
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
रहे दिल ही में तीर अच्छा जिगर के पार हो बेहतर
ग़रज़ शुस्त-ए-बुत-ए-नावक-फ़गन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तामीर-ओ-तरक़्क़ी वाले हैं कहिए भी तो उन को क्या कहिए
जो शीश-महल में बैठे हुए मज़दूर की बातें करते हैं
ओबैदुर रहमान
नज़्म
ये वो बस्ती ही नहीं
क्या करूँ क्या न करूँ हाथ में पत्थर भी नहीं
शीश-महलों को कोई ग़म भी नहीं डर भी नहीं



