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ग़ज़ल
सौ ख़ौफ़ की हो जाए मगर रिन्द-ए-नज़रबाज़
दिल जल्वागह-ए-लानशफ़-ओ-शुफ़ नहीं करता
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
नज़्म
सफ़र के वक़्त
ये बैंक-कार मैनेजर ये अपने टेक्नोक्रेट
कोई भी शुबह नहीं हैं ये एक अबस का ढिढोल
जौन एलिया
हास्य
जब कहा साफ़ ये मैं ने कि जो हो साहब-ए-फ़हम
तो निकालो दिल-ए-नाज़ुक से ये शुबह ये वहम
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
मो'तरिज़ क्यूँ हो अगर समझे तुम्हें सय्याद दिल
ऐसे गेसू हूँ तो शुबह दाम का हो या न हो
अकबर इलाहाबादी
शेर
शुबह 'नासिख़' नहीं कुछ 'मीर' की उस्तादी में
आप बे-बहरा है जो मो'तक़िद-ए-'मीर' नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
हिंदी ग़ज़ल
जिस में माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो
चाहता हूँ मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूँ

