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शेर
गदा-ए-शाह-ए-नजफ़ हूँ सो मेरे कासे से
जहाँ को चर्ख़-ए-सुख़न के सभी पते मिलेंगे
मुज़म्मिल अब्बास शजर
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ग़ज़ल
कोई है जो यहाँ इस कर्बला में जान पर खेले
कोई है जो यहाँ अब सूरत-ए-शाह-ए-नजफ़ निकले
अंजुम रूमानी
ग़ज़ल
अब तो जोश-ए-आरज़ू 'तस्लीम' कहता है यही
रौज़ा-ए-शाह-ए-नजफ़-अल्लाह दिखलाए मुझे



