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नज़्म
हमारे कमरे में पत्तियों की महक ने
अब इस में सीलन क्यूँ आ गई है....?
हमारा बिस्तर कि जिस में कोई शिकन नहीं है, उसी पे कब से,
फ़रीहा नक़वी
ग़ज़ल
दिल की दीवारों पे हम ने आज भी सीलन देखी है
जाने कब आँखें रोई थीं जाने कब बादल बरसा था
ज़ुबैर रिज़वी
ग़ज़ल
रोज़ इक बुझती हुई सीलन भरे कमरे की शाम
खिड़कियों में रोज़ मुरझाते ये बीमारी के दिन
अब्दुल अहद साज़
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शायरी के अनुवाद
देख कर ग़ुस्सा नहीं आता एक सीलन भरी खोली में
फ़ुट-पाथ पर दफ़्तर के सड़े हुए बिल में
मंगेश पडगावकर
ग़ज़ल
ख़ामोशी के नल से टपकतीं क़तरा-क़तरा आवाज़ें
दीवारों की सीलन पर है काई जैसा सन्नाटा

