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नज़्म
ए'तिराफ़
रेग को सिलसिला-ए-आब-ए-रवाँ जाना था
आह ये राज़ अभी मैं ने कहाँ जाना था
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
तुझ को परखता है ये मुझ को परखता है ये
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनात
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये भी क्या नज़्म-ए-जहाँ है कि अज़ल से अब तक
बस वही सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर बाक़ी है
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तो जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है
ये ज़रूर है कि ब-ईं हमा मिरा एहतिमाम-ए-नज़र भी है




