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नज़्म
सिंफ़-ए-नाज़ुक कहा गया मुझ को
रंगों से खुली दिलकशी है यही
सिंफ़-ए-नाज़ुक की नाज़ुकी है यही
सय्यदा सदफ़ अकबर
ग़ज़ल
ज़िंदगी की राहों में फूल मुस्कुराते हैं
लोग सिंफ़-ए-नाज़ुक से क़ुर्बतें बढ़ाते हैं
सरवत ज़ैदी भोपाली
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नज़्म
बिंत-ए-हव्वा
मेरे औसाफ़ गिनाने को ये काग़ज़ कम हैं
सिंफ़-ए-नाज़ुक हूँ मगर रूह मिरी रुस्तम है
हिना रिज़्वी
ग़ज़ल
सिंफ़-ए-नाज़ुक की तरफ़-दार मिरी ग़ैरत से
फूल से हाथों में ख़ंजर नहीं देखे जाते
वाहिद जमाल किरतपुरी
नज़्म
तवाइफ़
जानती है अपनी रुस्वाई को तो वज्ह-ए-नुमूद
सिंफ़-ए-नाज़ुक की खुली तौहीन है तेरा वजूद
माहिर-उल क़ादरी
हास्य
हम भी होते हैं कभी फ़ितरी तक़ाज़ों के शिकार
सिंफ़-ए-नाज़ुक को मगर रखते नहीं सर पे सवार
हिलाल सिवहारवी
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
जब करेगी सिंफ़-ए-नाज़ुक अपनी उर्यानी पे नाज़
सिर्फ़ इक तू इस तलातुम में रहेगी पाक-बाज़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
शहर-ए-निगाराँ
जंग-ए-आज़ादी की मश'अल बन गई हज़रत महल
और ऊँचा कर दिया है सिंफ़-ए-नाज़ुक का मक़ाम
फ़ातिमा वसीया जायसी
ग़ज़ल
सिंफ़-ए-नाज़ुक को अगर देनी है इज़्ज़त दिल से दे
दर-गुज़र कर दे ख़ताएँ हुस्न-ए-ज़न की बात कर
शहनाज़ रहमत
ग़ज़ल
वो बढ़ कर ख़ुद ही होता है मुख़ातिब सिंफ़-ए-नाज़ुक से
उसे ग़म भी नहीं होता है जब दस्तार गिरती है
सईद अहसन
हास्य
कार-गाह-ए-हुस्न है ये सिंफ़-ए-नाज़ुक के लिए
ख़र्च हो जाते हैं लाखों इक हसीं लुक के लिए