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नज़्म
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुफ़्लिसी
फिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगी
आख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मशवरा
तुम्हारी रूह को तन्हाइयाँ अता कर के
ये सोचती हो कि क्या मिल गया ज़माने को









