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नज़्म
ख़्वाब नहीं देखा है
सुबह घर छोड़ने का देर से घर आने का
बहते झरनों की खनकती हुई आवाज़ों का
वसीम बरेलवी
नज़्म
दस्तक
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
गुलज़ार
नज़्म
तुम्हारे हुस्न के नाम
निखर गई है कभी सुब्ह दोपहर कभी शाम
कहीं जो क़ामत-ए-ज़ेबा पे सज गई है क़बा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उद्धरण
इब्न-ए-इंशा
उद्धरण
सुबह उस वक़्त नहीं होती जब सूरज निकलता है। सुबह उस वक़्त होती है जब आदमी जाग उठे।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
एक आम सी लड़की
मगर बड़े ही तहय्युर से आज सुबह के वक़्त
सुनी है मैं ने मोहल्ले में एक बात नई
नरेश कुमार शाद
नज़्म
नया साल
सुबह हँसती रही बुझते रहे कितने चेहरे
चूड़ियाँ टूट गईं माँग के सिन्दूर उजड़े


