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हास्य
ख़ामोश हुईं बी-सारंगी और तबला सुम्मुन-बुकमन था
यूँ जैसे किसी ने ज़बाँ अपनी कौसर के आब से धो ली हो
ख़िज़्र तमीमी
नज़्म
तुम्हें लिखना न आता था
गली के कितने ही आवारा कुत्ते दुम दबा कर बैठ जाते थे
तुम्हारी एक सुम्मुन और बुकमुन की तिलावत से
इशरत आफ़रीं
नज़्म
फ़ता-कल्लमू तअ'रफू
अजीब मोजज़ा हुआ कि एक दिन
मैं अपने घर की डेवढ़ी में सुम्मुन बुक्मुम खड़ा हुआ
सत्यपाल आनंद
ग़ज़ल
किसी के 'इश्क़ की शिद्दत अभी जुनून में है
उबाल खाती निगाहों का दर्द ख़ून में है
अशहद करीम उल्फ़त
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ग़ज़ल
मैं अपने साथ ही दर-दर फिरूँ तो क्या होगा
और इस के बा'द न आया सुकूँ तो क्या होगा
धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़
ग़ज़ल
अपने जज़्बात को लफ़्ज़ों में दबाऊँ कब तक
मैं हक़ीक़त को मिरे ख़्वाब दिखाऊँ कब तक
इरफ़ान शाह नूरी
ग़ज़ल
मुंजमिद होंटों पे है यख़ की तरह हर्फ़-ए-जुनूँ
सर किसी सील-ज़दा शाख़ के मानिंद निगूँ
ज़िया जालंधरी
नज़्म
हिण्डोला
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदम
बहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन का