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ग़ज़ल
ज़माना वारदात-ए-क़ल्ब सुनने को तरसता है
इसी से तो सर आँखों पर मिरा दीवान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
पल दो पल में कुछ कह पाया इतनी ही स'आदत काफ़ी है
पल दो पल तुम ने मुझ को सुना इतनी ही ‘इनायत काफ़ी है
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
परिंदे की फ़रियाद
गाना इसे समझ कर ख़ुश हों न सुनने वाले
दुखते हुए दिलों की फ़रियाद ये सदा है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ
सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में
अब आगे का तहक़ीक़ नहीं गो सुनने को हम सुनते थे
उस नार की जो जो बातें थीं उस नार के जो जो क़िस्से थे



